गाउट-वातरक्त की चिकित्सा में ना करें देरी, घातक हो सकती है यह लापरवाही
गाउट-वातरक्त की चिकित्सा में ना करें देरी, घातक हो सकती है यह लापरवाही
गाउट-वातरक्त की चिकित्सा में ना करें देरी, घातक हो सकती है यह लापरवाही

गाउट-वातरक्त का रोग शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ जाने के कारण हो जाता है । विशेष रूप से यह पैर के अंगूठे के जोड़ों में होता है लेकिन इसके अलावा यह शरीर के छोटे किसी भी जोड़ में अपना प्रभाव दिखा सकता है । चलिये जानते हैं इस रोग के बारे में बहुत ही उपयोगी जानकारी ।
गाउट-वातरक्त रोग होने के कारण :-
आयुर्वेदिक मत के अनुसार शरीर में विभिन्न कारणों से कुपित हुआ वात रक्त को शरीर के विभिन्न हिस्सों में से निचले भागों में धकेलने का काम करने लगता है । इस दशा में अनुचित आहार और विहार का सेवन करने से धकेला जाता हुआ यह रक्त पैरों और हाथों की उंगलियों के छोटे जोडों में इक्ट्ठा होने लगता है और वातरक्त रोग उत्पन्न हो जाता है । आधुनिक मत के अनुसार शरीर में प्यूरिन नामक तत्व के मेटाबॉलिज्म में विकार आ जाने के कारण शरीर में युरिक एसिड का निर्माण और स्तर बढ़ जाता है । जब यह अतिरिक्त यूरिक एसिड मूत्र के द्वारा शरीर से बाहर नही निकल पाता है तो यह शरीर के छोटे जोड़ों में संचित होना शुरू हो जाता है और गाउट नामक रोग को उत्पन्न कर देता है ।
गाउट-वातरक्त के लक्षण :-
हाथ पैरों की उंगलियों के जोड़ों में विशेष रूप से और अन्य छोटे जोड़ों में भी जलन और दर्द का अनुभव होता है और कुछ रोगी जकड़न की भी अनुभूति बताते हैं और इन जोड़ों में सूजन आ जाती है । शरीर के अन्य भागों की अपेक्षा इन जोड़ों का तापमान कुछ बढ़ा हुआ होता है जो छुने पर स्पष्ट मालूम हो जाता है । कभी कभी गाउट-वातरक्त के इस रोग का प्रारम्भ कलाई और ऐडी के जोड़ से भी प्रारम्भ होता है । रोग ज्यादा बढ़ जाने पर शरीर में बुखार भी रहने लगता है और जोड़ों का आकार विकृत होने लगता है । यदि छोटे जोड़ों में लक्षण प्रारम्भ होने पर चिकित्सा पर ध्यान ना दिया जाये तो बड़े जोड़ों में इसके फैल जाने की सम्भावना रहती है ।
गाउट-वातरक्त में पथ्यापथ्य :-
गाउट-वातरक्त का रोग हो जाने पर उचित खानपान और परहेज का ध्यान रखा जाना बहुत आवश्यक हो जाता है । इस रोग में पुराना चावल, जौं, गेहूँ, मूंग, मसूर, करेला, परवल, बथुआ, ऑवला, मुनक्का, किशमिश, मक्खन, गाय के दूध से बना घी, दूध, चने और गेहूँ की रोटी आदि का सेवन करना पथ्य होता है । मिर्च-मसालेदार खाने, स्वादिष्ट और चटपटे भोजन, चाय और कॉफी, आदि चीजों का सेवन पूरी तरह से त्याग कर देना चाहिये । इसके अलावा उड़द, कुल्थी, सेम, तिल, दही, खट्टे पदार्थ, समुन्द्री नमक का सेवन अपथ्य होता है । दिन में सोना और रात को जागना पूरी तरह से वर्जित होता है । आगे हम बात करेंगे गाउट-वातरक्त के रोग में लाभकारी कुछ प्रयोगों के बारे में ।
गाउट-वातरक्त के लिये प्रयोग नम्बर एक :-
हरीतकी ( हरड़) का चूर्ण रोज सुबह और शाम को 3-3 ग्राम की मात्रा में गुड़ अथवा गुनगुने पानी के साथ रोज करना चाहिये और पीपल की छाल 20 ग्राम लेकर उसका काढ़ा बनाकर रोज एक बार पीना चाहिये ।
गाउट-वातरक्त के लिये प्रयोग नम्बर दो :-
अमलतास का गूदा और गिलोय का तना 10-10 ग्राम लेकर काढ़ा बना लें और इसमें 5 ग्राम एरण्ड का तेल मिलाकर रोज सुबह और शाम को पीने से यह गाउट-वातरक्त के रोग को नाश करता है ।
गाउट-वातरक्त के लिये प्रयोग नम्बर तीन :-
गोरखमुण्डी का चूर्ण 5 ग्राम, गाय के दूध से बना घी 10 ग्राम, और शहद 20 ग्राम लेकर मिलाकर रोज एक बार चाटने से लाभ मिलता है ।
गाउट-वातरक्त के लिये आयुर्वेदिक चिकित्सा :-
गाउट वातरक्त के रोग के समाधान के लिये आयुर्वेदिक चिकित्सा एक अच्छा विकल्प है । इसकी सम्पूर्ण आयुर्वेदिक चिकित्सा के लिये आप अपने आसपास किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक सए परामर्श कर सकते हैं । प्रकाशित आयुर्वेदिक क्लीनिक, मेरठ के द्वारा भी गाउट-वातरक्त की उचित आयुर्वेदिक चिकित्सा उपलब्ध होती है ।
गाउट-वातरक्त के रोग के समाधान के लिये इस लेख में बताये गये सभी घरेलू प्रयोग हमारी समझ में पूरी तरह से हानिरहित हैं, फिर भी आपके आयुर्वेदिक चिकित्सक के परामर्श के बाद ही इनको प्रयोग करने की हम आपको सलाह देते हैं । ध्यान रखें कि आपका चिकित्सक ही आपके रोग और शरीर को सबसे अच्छी तरह से समझता है और उसकी सलाह का कोई विकल्प नही होता है ।
गाउट-वातरक्त रोग के बारें में इस लेख के माध्यम से दी गयी यह जानकारी आपको अच्छी और लाभकारी लगी हो तो कृपया लाईक और शेयर जरूर कीजियेगा । आपके एक शेयर से किसी जरूरतमंद तक सही जानकारी पहुँच सकती है और हमको भी आपके लिये और बेहतर लेख लिखने की प्रेरणा मिलती है । इस लेख के समबन्ध में आपके कुछ सुझाव हों तो कृपया कमेण्ट करके हमकों जरूर बताइयेगा ।
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