आयुर्वेद का मूल वात पित्त कफ सिद्धान्त की मूलभूत जानकारी
आयुर्वेद का मूल वात पित्त कफ सिद्धान्त की मूलभूत जानकारी
आयुर्वेद का मूल वात पित्त कफ सिद्धान्त की मूलभूत जानकारी

कही पर भी आयुर्वेदिक सिद्धान्तों को पढ़ोगे तो उसमें सभी रोगों में वात पित्त और कफ का वर्णन होता है । वस्तुतः आयुर्वेद में सम्पूर्ण चिकित्सा ही वात पित्त कफ के आधार पर की जाती है । वात पित्त और कफ को मिलाकर त्रिदोष कहा जाता है । इनका एक छोटा सा वर्णन आपके लिये हम प्रस्तुत कर रअहे हैं जिससे आपको भी समझ आयेगा कि आयुर्वेदिक चिकित्सा का मूल किस तरह से समझा जाये । भले ही आप चिकित्सक ना हों किन्तु यह जानकारी आपको मालूम होनी ही चाहिये ।
वात दोष
तीनों दोषों में वात प्रधान है और शरीर की सभी क्रियाएं वात के द्वारा ही सम्भव हो सकती है । वात अर्थात वायु । यदि वात ना हो तो शरीर की सभी क्रियाएं रुक जायेंगी ।
वात प्रकोप के सामान्य लक्षण :-
शरीर रूखा और सूखा होता है । वात के प्रकोप से शरीर सूख कर दुर्बल हो जाता है और रंग काला पड़ने लगता है । त्वचा सूखी रहती है और अपेक्षाकृत कुछ श्यामवर्ण की होती है । शरीर कृशकाय और शीतल रहता है । शरीर में कड़कपन और जकड़न रहती है ।
वात वर्धक आहार :-
चावल, चने की भाजी, भूने हुए चने, मोठ, मसूर, तुवर, शक्कर, फूलगोभी, मटर, सेम, पालक सूखे मेवे, चाय, कॉफी, शराब और सिगरेट आदि वातवर्धक आहार होते हैं ।
वात शामक आहार :-
गेहूँ की चपाती, कुल्थी, उड़द, सरसों, तिल्ली का तेल, गाय का दूध, छाछ, घी, मिश्री, अदरक, पोदीना, परवल, बथुआ, लौकी, मूली, गाजर, चौलाई, अंगूर, नारंगी, फालसा, शहतूत, पपीता, पके आम, मीठा अनार, अखरोट, बादाम, अंजीर, मुनक्का आदि पदार्थ वात का शमन अर्थात शरीर में बढ़ी हुई वायु को कम करने वाले होते हैं ।
पित्त दोष
पित्त दोष अग्नि तत्व प्रधान वाला होता है । शरीर में दाह और ऊष्मा पैदा करने वाला होता है ।
पित्त प्रकोप के सामान्य लक्षण :-
शरीर में जलन, आँखों में लाली और पीलापन, अधिक गरमी लगना, त्वचा छुने में गरम महसूस होना, फोड़े फुन्सी होना, त्वचा, मल मूत्र, व आँखों में पीलापन, गले में जलन, प्यास ज्यादा लगना, मुँह में कड़वापन और खट्टापन महसूस होना और अक्सर पतले दस्त लग जाना आदि पित्त दोष के प्रकोप के सामान्य लक्षण होते हैं ।
पित्त वर्धक आहार :-
उड़द की दाल, सरसों, खट्टा दही, छाछ, आइसक्रीम, गुड़, मेथी, हींग, खट्टे फल, तले हुए खाद्य पदार्थ, और गर्म प्रकृति के आहार आदि के सेवन से शरीर में पित्त दोष की वृद्धि होती है ।
पित्त शामक आहार :-
चावल, जौ, गेहूँ, ज्वार, सत्तू, मसूर, तुवर, दलिया, गाय का दूध, मलाई, पनीर, घी, मक्खन, मीठा दही, खीर, मिश्री, परवल, बथुआ, करेला, टिंडा, तुरई, धनिया, पत्ता गोभी, खीरा, प्याज, मीठा अनार, तरबूज, ऑवला, मुनक्का, केला, नारियल, शहतूत, सेब, और आलू बुखारा आदि ।
कफ दोष
कफ दोष मृदुता कारक और शरीर को शांत बनाने वाला होता है ।
कफ प्रकोप के सामान्य लक्षण :-
शरीर में भारीपन, शरीर में थकावट और आलस्य बना रहना, ठंड की अधिकता बनी रहना, त्वचा में चिकनापन, मुँह में मीठा मीठा सा स्वाद बना रहना, लार का अधिक बनना, भूख कम लगना, अरुचि, मंदाग्नि बनी रहना और मल आँव युक्त आना आदि कफ दोष के प्रकोप के सामान्य लक्षण हैं ।
कफ वर्धक आहार :-
चावल, उड़द, नया गेहूँ, तिल, जैतून, बादाम, दूध से बने पदार्थ, आईसक्रीम, गन्ने के रस से बने पदार्थ ( सिरका छोड़कर ) आलू, अरबी, बैंगन, लोकी, तुरई, मटर, केला, सिंघाड़ा, अमरूद और मीठे फल आदि के सेवन सए कफ दोष की वृद्धि होती है ।
कफ शामक आहार :-
पुराना गेहूँ, जौ, मूंग, मोठ, मसूर, चना, कुल्थी, बथुआ, टिंडे, करेले, अदरक, गाजर, खीरा, लहसुन, प्याज, अनार, सेब, तरबूज, बेल, व सूखे मेवे आदि का सेवन करने से बढ़े हुए कफ दोष का नाश होता है ।
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