कालीजीरी इन 13 रोगों का काल है, इसके चमत्कारी फ़ायदे जान हैरान रह जाएँगे आप

कालीजीरी इन 13 रोगों का काल है, इसके चमत्कारी फ़ायदे जान हैरान रह जाएँगे आप

कालीजीरी इन 13 रोगों का काल है, इसके चमत्कारी फ़ायदे जान हैरान रह जाएँगे आप

कालीजीरी
कालीजीरी
काली जीरी आयुर्वेदिक ग्रन्थों में वर्णित एक बहुत ही उत्तम औषधि है जिसका उल्लेख जगह जगह सोमराजी, सोमराज, वनजीरक, तिक्तजीरक, अरण्यजीरक, कृष्णफल आदि नाम से किया गया है । इसके गुणों के बारे में हम आपको इस लेख में बता रहे हैं ।

कालीजीरी का वर्णन :-

कालीजीरी किसी भी तरह का कोई जीरा नही होती है और ना हि ये कलौंजी ही होती है । कालीजीरी बस कालीजीरी ही होती है । इसका स्वाद कड़वा होता है और महक तेज होती है । किसी भी जगह पर इसका प्रयोग खाना बनाने में नही होता है और इसको सिर्फ दवायें बनाने के लिये ही प्रयोग किया जाता है । बॉटनीकल भाषा में इसका नाम सेंट्राथैरम एनथेलमिनटिकम होता है । इसके नाम में आने वाले एनथेलमिनटिकम शब्द से ही पता चल जाता है कि यह शरीर की बाह्य कृमियों से रक्षा करता है । इसके अलावा इसको कई तरह के चर्मरोगों जैसे कि सफेद दाग, खुजली, सूखा और गीला एक्जीमा आदि रोगों में प्रयोग किया जाता है । अब हम इसके गुणों का विस्तार से वर्नन करेंगे ।

कालीजीरी के तेरह गुण :-

1 :- यह पेट में हो जाने वाले कृमियों को मारती है और हल्का दस्त लगाती है अर्थात कब्जनाशक भी है ।
2 :- प्रकृति में गर्म होने के कारण यह श्वास से समबन्धित रोगों और कफ की समस्या में प्रयोग की जाती है ।
3 :- इसके सेवन से पेशाब ज्यादा आता है । अतः इसका सेवन मूत्र कम आने की समस्या और बढ़े हुये रक्तचाप की समस्या में किया जाता है ।
4 :- बिना कारण के बार बार लगने वाली हिचकियों की समस्या में भी इसके सेवन करने से लाभ मिलता है ।
5 :- यह एक अच्छा एण्टीसेप्टिक सिद्ध होता है इसलिये इसको त्वचा के विकारों जैसे कि खाज-खुजली और खारिश, सूजन, सफेद दाग आदि की समस्या में बाहरी तौर पर लेप बनाकर लगाने के काम में लाया जाता है ।
6 :- परजीवी नाशक होने के कारण यह शरीर में पलने वाले सभी बाह्य जन्तुओं को साफ करने के लिये प्रयोग की जाती है ।
7 :- चर्मरोगों में यदि इसको नीम के तेल के साथ बाहरी रूप से मालिश किया जाये और कत्थे के साथ मिलाकर सेवन करवाया जाये तो बहुत ही अच्छा लाभ देती है ।
8 :- दुःसाध्य चर्म रोगों जैसे कि कोढ़ की अवस्था में कालीजीरी और काले तिल का दो-दो ग्राम का मिश्रण बनाकर सुबह थोड़ा व्यायाम करके पसीना आने पर गरम पानी के साथ सेवन करना चाहिये । इस तरह के रोगों में कम से कम एक साल तक प्रयोग किया जाना चाहिये ।
9 :- सफेद दाग के रोग में काली जीरी चार भाग लेकर उसमें एक भाग हरताल मिलाकर गौमूत्र के साथ घिसकर लेप करना चाहिये और काले तिलों के साथ ही सेवन करना चाहिये ।
10 :- बवासीर के रोग में आराम के लिये 200 ग्राम भुनी कालीजीरी और 200 ग्राम कच्ची कालीजीरी को एक साथ पीसकर चूर्ण बना लें । इस चूर्ण को 3-3 ग्राम रोज दिन में तीन बार खाने से दोनों तरह की सादी और खूनी बवासीर ठीक होती है ।
11 :- पेट में कीड़े हो गये हों तो रात को सोते समय इसका तीन ग्राम चूर्ण आधा चम्मच अरण्डी के तेल के साथ सेवन करके सोना चाहिये । इससे पेट के कीड़े मरकर बाहर निकल जाते हैं ।
12 :- खुजली का रोग हो गया हो तो कालीजीरी को पीसकर उसका हल्दी और नारियल तेल के साथ पेस्ट बनाकर सारे शरीर पर लेप करना चाहिये और आधे घण्टे बाद मुलतानी मिट्टी से नहा लेना चाहिये ।
13 :- कुष्ठ के रोग में कालीजीरी-वायविडंग-सेंधानमक मिलाकर गौमूत्र में पीसकर लगाना चाहिये ।
इस लेख के माध्यम से लिखे गये सभी उपचार हमारी समझ में पूरी तरह से हानिरहित हैं । फिर भी आपके आयुर्वेदिक चिकित्सक के परामर्श के बाद ही इनको प्रयोग करने की हम आपको सलाह देते हैं । ध्यान रखिये कि आपका चिकित्सक आपके शरीर और रोग के बारे में सबसे बेहतर जानता है और उसकी सलाह का कोई विकल्प नही होता है ।
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